Prem Or Kala ka Milan // प्रेम और कला का मिलन

” सुनो, तुम यहॉं क्या कर रही हो ? बारिश में भीगती हुई हर लड़की सुंदर नहीं लगती! एक तो मुझे मेरे ही सामने दिख रही है “,
उसने मुझ पर तंज कसते हुए कहा पर फिर भी मैंने बारिश में भीगना जारी रखा !! कुछ देर तक तो वो मुझे घूरता रहा पर फिर उसने मुझे कसकर पकड़ा, मेरी ऑंखों में झॉंका और मुझे बारिश से दूर लाकर ऑंगन के पास वाले बरामदे में खड़ा कर दिया, 

“आजकल देख रहा हूँ, तुम मेरी बातों को बहुत आसानी से झुकलाने लगी हो ? भला, ऐसा भी क्या होता है, इस बारिश में जो तुम लड़कियां सबकुछ भूलकर इसमें भीगने लगती हो “, उसने मेरी बाजुओं पर अपनी पकड़ ढीली करते हुए कहा तो मैंने हँसते हुए अपने गीले बालों को लहराते हुए उसके चेहरे पर बारिश कर दी । 

” क्या कर रही हो ?! देखो, मुझे ये सब बिल्कुल भी पंसद नहीं है, मैं तुम्हारा प्रेमी जरूर हूँ, पर मुझे तुम्हारी तरह प्रकृति से लेकर हर इंसान से प्रेम करना नहीं आता ! वैसे भी आजतक मैं समझ नहीं पाया हूँ कि मैं कब-क्यों तुमसे प्रेम करने लगा और अभी तक किये जा रहा हूँ, ये कोई काम तो नहीं जो मुझे करना ही है !! “, वो अपने सवालों से खुद ही परेशान होकर खिड़की के पास जा बैठा और मैं अपने गीले कपड़े बदलने चली गयी, जब लौटी तो देखा वो खिड़की के पास रखी किताबों के पन्नों को उलट-पलट रहा था ! 

” क्या कर रहे हो ? “, मैंने उसके पास बैठते हुए कहा तो वो बोला, ” तुम्हारी किताबें भी तुम्हारी बारिश की तरह ही है, मेरी समझ से परे ! मेरे एक भी सवाल का जवाब नहीं दे पाती है, ये ! कब से पूछना चाह रहा हूँ, कि मुझे प्रेम हुआ ही क्यों ? और अब भी क्यों किये जा रहा हूं ! अब तुम मुझे अजीब लगने लगी हो, तुम्हारी हरकतें भी कुछ इस तरह की हो गयी है पर जब भी तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो मेरे दिल की धड़कनों का हिसाब बिगड़ जाता है..उस बारिश में भी मुझे तुम्हारी सेहत की फ्रिक हो रही थी, वहीं कोई प्रेमी होता तो तुम छूता, तुम्हारी सुंदरता को अन्य अन्य तरीकों से परिभाषित करता, तुम ही बताओ क्या करूं मैं ?! “, वो मुझे परेशान लगा तो मैं रसोईघर में गयी और झट से उसके लिए उसकी मनपंसद चाय बना लायी और फिर आराम से उसके पास बैठ गयी । 

” सिर्फ एक कप चाय ? तुम्हें नहीं चाहिये ! “, उसके सवाल का जवाब देते हुए मैंने उस कप को उठाया, एक सिप ली और फिर उसके सामने वो कप रख दिया पर फिर उसने वो कप उठाया ही नहीं, उसने कहा, ” बारिश में तुम भीगी थी, मैं नहीं ! तुम ही पीयो, ताकि बीमार ना पड़ जाओ ! “, जब मैंने उसकी बात को सुना तो फिर से उसे उसकी कही बात पर गौर करने के लिए कहा । कुछ देर तक हमारे बीच खामोशी रही पर जब वो वहॉं से जाने लगा तो मैं बोली, और मैं बोलती ही चली गयी जब तक मुझसे बोला गया और उससे सुना गया । 

” मुझे याद है, अभी भी वो एक काली रात जब मैं अनजान रास्ते पर बेफ्रिक होकर चल पड़ी थी, बिना किसी डर के, बिना किसी की परवाह किये हुए कि कोई क्या सोचेगा क्योंकि अगर ये पहले ही सोच लेती तो फिर शायद ही कभी अपने घर की दहलीज को पार कर पाती ! सोचना बहुत बुरा होता है, क्योंकि वो आपको बार बार रोकता है, आपकी मंजिल को कभी आपके दूर तो कभी आपके पास ला खड़ा कर देता है । खैर, मैं चल रही थी पर मुझे कहॉं पता था, कि मेरे साथ मेरे पैरों में जकड़े घुंघरूओं की आवाज भी मेरे साथ चल पड़ी है ! वो तो भला हो, आधी काली रात में सड़कों पर चलते-फिरते भला मानुषों का जिन्होंने अपनी काली जुबान से चिल्लाते हुए बता दिया कि मेरे पैरों में बंधी जिम्मेदारियों ने आज अपना दायरा अनजाने में ही बढ़ा दिया है और अपनी आवाज से सबके अन्दर के जानवर को आधी रात में जगाने का काम बखूबी कर रहे है !! जैसे ही मैंने अपने पैरों की तरफ देखा तो पहले उन घुंघरूओं को कोसा और फिर खुद को, थोड़ा से  झुककर बैठी और उन्हें निकालने लगी पर जैसे उस रात उन्होंने मेरे पैरों को कुछ ज्यादा ही जकड़ लिया था, वो निकल ही नहीं रहे थे ! मेरी कोशिशों के विफल होने के बाद मैं मजबूरीवश होकर रास्ते पर आगे चल पड़ी, इस बार अपनी निगाहों को झुकाकर, इतनी झुकी हुई निगाहें कि मैं जमीन में कहीं गड़ ही नहीं ना जाऊँ !! मैं बार बार बीच में रूकती और उन घुंघरूओं को निकालने की कोशिश करने लगती पर वो टस से मस नहीं होते । 

फिर ऐसे ही एक बार कोशिश करने बैठी तो मुझे मेरे पैरों पर अनजाने हाथों का अहसास हुआ, वो मेरे पैरों में बंधी जजीरों को सलीके से खोलने लगा और फिर कुछ देर बाद, वो जंजीरे मेरे बैग में थी और वो अनजान शख्स मेरे साथ चल रहा था, कह रहा था ‘ दुनिया एक दायरे में सिमटी हुई है और तुम्हारी ये जंजीरे तुम्हें कभी इस दायरे के अन्दर प्रवेश नहीं करने देंगी ! “, मैंने पलटकर पूछा, ” पर मैं क्या ही कर सकती हूँ, मेरे हाथ में तो कुछ भी नहीं ! जो भी है, पैरों में ही है, कमर में है और इन ऑंखों में है जिनमें कई लोगों को दिखता है, नशा ! क्या तुम्हें भी दिखा ? “, बिना कुछ सोचे बोलने के बाद मैंने अपने होठों पर किसी बच्चे की तरह हाथ रखा और उन्हें भींचकर आगे चलने लगी पर वो वहीं रूक गया, और कहने लगा, ” हॉं, मुझे दिखता है तुम्हारी ऑंखों में नशा, तुम्हारी कमर में भी एक लचक सी महसूस होती है पर जैसे ही नजर पैरों पर जाती है, वो जंजीरों में बंधे नजर आते है, तुम्हारे मेरे रास्ते अलग है, तुम जंजीरों में बंधी और मैं आजाद हूं ! मैं उस तरफ जा रहा हूं, तुम चाहो तो अपने हाथों पर भरोसा करके मेरे साथ चल सकती हो, वैसे भी जिस घर तुम जा रही हो..वहॉं जिम्मेदारियों के बोझ तले तुम इन जंजीरों को कभी भी खुद से अलग नहीं कर पाओगी !! “, उसकी बातों पर ध्यान देते हुए मैंने उसकी तरफ देखा तो उसके कँधे पर एक लम्बा सा बैग लटका हुआ था, जिसमें कई सारी पेंटिग्स रखी हुई थी, वो एक कलाकार था ! पर कलाकार तो मैं भी थी, पर शायद जगह का फर्क था ! मैं लोगों के लिए नचनिया थी, घरवालों के लिए रोटी कमाने वाली और खुद के लिए..कभी सोचा ही नहीं ! पर तब मैंने बहुत सोचा और सोचते सोचते उसके साथ उसके दिखाये रास्ते पर चल पड़ी और आज देखो मैं कहॉं हूं, एक साफ सुथरे मकान में, हाथ की रेखाओं में रंगों की लहरों के निशान है, पैरों पर अभी भी घुंघरु है पर अब उनकी पकड़
जंजीरों जैसी नहीं है, मैं उस दूसरे घर तक रोटी पहुँचाती भी हूँ, खुद खाती भी हूँ और उस दायरे में रहती भी हूं !! पर तुम कहोगे, ये तो मेरी कहानी थी..तुम्हें तुम्हारे सवाल का जवाब तो
मिला ही नहीं ! पर वो पीछे रह गया, ना उस रास्ते पर..

तुमने मेरी तरफ इंसानियत का हाथ बढ़ाया और मैं साथ चलने लगी, फिर हम दोनों करीब आये और हम इसे प्रेम समझने लगे ! पर शायद ये प्रेम नहीं, हम वो पक्षी है जिनके घौंसलों में हर दिन आग लग रही थी पर दोनों में से किसी ने भी गौर नहीं किया, ना ही तुम्हें तुम्हारी कला की कमजोरी महसूस हुई ना ही मुझे मेरी कला की बदनसीबी ! पर जैसे ही साथ आये तो प्रेम की बारिश से दोनों के घर पूरी तरह जलने से बच गये, जब तुम्हारी-मेरी कला का मिश्रण हुआ तो कुछ एेसा बना ( मैंने उसे उसकी पेंटिग्स दिखाते हुए कहा ) हॉं, पर अब तुम्हें लगने लगा है कि मैं तुम्हारे लिए सिर्फ एक जिम्मेदारी रह गयी हूं, प्रेम नहीं ! पर क्या मेरी सेहत के लिए बारिश से नफरत करना, अपनी मनपंसद चाय को सिर्फ मेरी सेहत के लिए नजरअंदाज कर देना, रात भर जागकर मेरी जंजीरों को अपनी मेहनत की बारीकियों से तोड़ देना..प्रेम नहीं ?! अगर फिर भी तुम्हें इस प्रेम से आजाद होना है तो हो जाओ, उड़ जाओ किसी दूसरे आगंन में, मैं यहीं बैठकर हमारे इस घौंसले को अपनी कला से, अपने प्रेम की बारिश में भिगोकर बचाती रहूंगी.. “,

Prem Or Kala ka Milan

जब मुझे लगा इतना कहना काफी नहीं है, तो मैंने उसे गला लगा लिया और अपनी ऑंखों की बारिश से उसकी सफेद कमीज को भिगो दिया, जैसे बिना कुछ कहे उसे रोकना चाह रही हूं पर वो रूका नहीं.. 

उसने वो पेंटिग्स ली और एक बक्से में रख दी, और मुझसे गले लगते हुए कहने लगा, ” कब काम करते हुए प्रेम को काम समझने लगा, पता ही नहीं चला ! ना ही तुम जिम्मेदारी हो, ना ही तुम मेरे पैरों की जंजीर हो, तुम तो मेरा प्रेम हो जिसे मुझे अब प्रेम समझने की जरूरत नहीं है, बस निभाने की जरूरत है, वो भी साथ में बारिश में भीगते हुए, एक ही चाय के कप से तुम्हारे होठों को अपने होठों पर लाते हुए, तुम्हारे साथ कहानियों को लिखते हुए, तुम्हारे साथ कुछ सुनहरे गानों पर थिरकते हुए, हम दोनों के लिये एक खूबसूरत घौंसला बनाते हुए “, 

The end ❤️

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