Bahut Dino Se Ek Khat, Chitthi Likhne Ki Soch Raha Tha // बहुत दिनों से खत, चिट्ठी लिखने की सोच रहा था

डियर निया 

यूँ तो मैं तुम्हें बहुत दिनों से चिट्ठी लिखने की सोच रहा था, बात करना चाह रहा था.. बस, मुझसे हो ही नहीं पा रहा था !!

Bahut Dino Se Ek Khat

आजकल में जिस कहानी को लिख रहा हूँ, उसने मुझे कदम कदम पर थकाया है, वहीं कुछ कहानियां  ऐसी होती है जो आपको हवा की तरह हल्का कर देती है, और आप उड़ने लगते हो। अब ऐसा भी नहीं है कि मैं इस कहानी को लिखने की चाह नहीं रखता, बस होता यूं है कि जब भी मैं इस कहानी में डूब जाता हूँ, उस किरदार में तुम्हारी स्नेहा कहीं भी नहीं रहती है…
बहुत बार तो मुझे लिखने के बाद खोखलापन से महसूस हुआ है, कि अब आगे क्या ?!
जब इंसान आगे के बारे में सोचता है तो जरूरी है, कि उसके पीछे में भी बहुत कुछ हुआ हो पर मसला तो यहीं है कि आज भी ये कहानी वहीं खड़ी है जहॉं शुरूआत में खड़ी थी, कहानी की बीच मुलाकात में तो कदम कदम पर प्यार की बरसात हुई पर मेरा वाला किरदार ‘ EMPTY ‘ उसे अपने अन्दर सोख ही नहीं पाया !! तुम्हें पता है, जो पिया है, ना..वो कुछ तुमसा ही है, भला कौन किसी से इतना प्यार कर सकता है, जितना मैंने तुमसे  किया और उसने रियाज से !
जब भी उसकी डायरी लिखने बैठता तो कुछ अजीब सा ही होता, मैं लिखने लगता वो दर्द जो मैंने कभी महसूस नहीं किया, मैं लिखने लगता प्यार करने की हद.. हॉं, आज मैं कह रहा हूँ कि प्यार करने की भी हद होती है, वरना प्यार प्यार नहीं सपना लगने लगता है !! अरे, हॉं सपने ! कितने ही अजीब होते है, ना कुछ सपने जो हम खुली ऑंखों से देखते है, वहीं कुछ सपने जो हम बंद ऑंखों से देखना चाहते है, पर वो भी टूट जाते है..ऐसे ही आज सपने में देखा कि तुम मुझसे दूर जा रहे हो, और जैसा ही मुझे मालूम हुआ तो तुम्हें बुलाने के लिए तुम्हारे पीछे चल पड़ा, मन्नत करने ही लगा था कि रूक जाओ.. तुमने मुझे टूटते हुए देखा ही था कि सपना टूट गया ! सोचता हूँ, अगर दो पल के लिए और सपना ठहर जाता तो क्या तुम रूक जाते, मैं तुम्हें बता पाता कि बहुत सी बातें करनी है, तुमसे प्यार हो गया है, मुझे..और शायद तुम्हें  किसी और को..जानता हूँ, ये कहोगे कि ” मेरे रियाज से किसी को प्यार हो जाना तो लाजिमी है कि वो है ही ऐसा , मुझे भी तो कभी ऐसे ही हो गया था “, वो खुद को रकीब कहता है, मुझे शब्द का मतलब नहीं पता था पर क्योंकि तुम भी कभी रकीब हुए ही होंगे तो यकीकन इस शब्द को करीब से महसूस कर सकते होंगे । वो होता है, ना हम किसी के प्यार के रकीब होकर ही अपने प्रेम की तलाश के सफर पर निकलते है..मुझे याद है, एक दिन हैरी की डायरी के लिखने का सफर खत्म हुआ तो ऐसा लगा जैसे, मैं खुद भी खत्म सा हो गया हूँ, उस पल अगर तुम भी पास होते तो तुम्हें पकड़ता और खुद से डायरी सुनाता पर मेरे हाथ में तो अब खाली कुर्सियां ही उठाना लिखा है, फिर किसी दोस्त से पूछा तो उसने एक शर्त पर डायरी पढ़ी, शर्त यहीं कि ” मुझे भी कभी इस तरह खत्म होने का अहसास हो तो बस मुझे सुन लेना “, शायद कभी कभी शर्त रखना भी जरूरी होता है, ताकि दुनिया के लोगों का कहना-सुनना चलता रहें, कहीं कोई चुप्पी के डर में ही घुलते हुए दूसरी दुनिया में ना पहुँच जाए । मैं जानती हूँ, तुम उसका शुक्रियादा करोगे और उससे जलोगे भी, यहीं होता है, ना प्यार में..कि कोई हमारे प्यार को संभाल भी ले तो वो ही क्यों संभाले, हम क्यों नहीं ?! पर तुम यहॉं नहीं, मेरी पास वाली कुर्सी खाली है, और मैं तुम्हें महसूस करते हुए ही उसके करीब जाने की कोशिश में हूँ । मुझे मालूम है, मुझे जब ये कहानी पूरी होगी तो फिर टूटूँगा  मैं, पर तब तुम्हें ही कहानी सुनाने की नाकाम कोशिश करूंगा, मैं ।। 

तुम्हाता  पागल
बेवकूफ- एम्प्टी  ।।

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