मैं अक्सर तारों के शहर में घूमने निकल पड़ता हूँ _#Empty जज्बात

 मैं अक्सर तारों के शहर में घूमने निकल पड़ता हूँ

जहाँ ना औकात दिखती है ना ही

तारों की चमक में किसी की हैसियत

दिन में शहर रंगीन और काफ़ी बड़ा दिखता है

पर रात के अंधकार में इसकी भव्यता

और भी विशालकाय हो जाती है

इस शहर में बोलने को ज़ुबाँ की ज़रूरत नहीं होती

इन तारों में तो एक अलग ही ऊर्जा का प्रभाव है

वो कहते हैं न की ख़ामोशी बोलती-सुनती नहीं

यहाँ तो सब कुछ एक तरँग में बहता सा लगता है

जैसे हँसने को होंठ नहीं रोने को आँसूँ की ज़रूरत नहीं

बस सारी बातें दिल से होती हैं और ख़ामोशी ही इनकी ज़ुबाँ है

वैसे मेरे काफी सारे दोस्त बन चुके हैं यहाँ

दिन के उजाले में मुझे दूर से निहारते रहते हैं सब

पर रात होते ही छुप्पन छुपाई शुरू हो जाती है इनकी


बस ख़ामोशी को ही समझने का हेर फ़ेर है

वरना कुछ लोग यूँही अंधकार से घबरा जाते हैं

और मुझे बेसब्री से इंतेज़ार होती है हर रात

एक नई दुनिया में चले जाने की


_#Empty


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