तुम अलग हो मेरे जज्बात में // Tum Alag Ho Mere Jajbaat Me

“पूरी शिद्दत से चाहना” ये बस सुना था मैंने और शायद हमेशा स्त्रियों के संदर्भ में ही सुना था…मतलब मुझे ये बताया और समझाया गया था कि किसी से टूट कर शिद्दत से इश्क करना पुरूषों के बस का नहीं ये सिर्फ एक औरत ही कर सकती है…अपना सबकुछ न्यौछावर कर प्रेम करना सिर्फ एक औरत के ही बस का है।
मुझे भी जब तुमसे प्यार हुआ तो मैंने यही महसूस किया कि मैं तुमसे जिस क़दर प्यार करती हूं जिस हद तक करती हूं… तुम नहीं कर सकते और मुझे कभी इस बात का मलाल नहीं हुआ कि तुम मुझसे मुझ जितना प्यार क्यों नहीं कर रहे… मेरे दिलो-दिमाग ने हमेशा से बस ये चाहा कि तुम बस साथ रहो जब तक तुम रह सकते हो….प्यार भी तब तक ही करो जब तक तुमसे किया जाता है इसलिए नहीं कि मुझे तुम्हारे प्यार की जरूरत है। मैं बस चाहती थी कि जब कभी थकने लगूं ना तो हाथों में तुम्हारा हाथ मिले और सिर रखने को तुम्हारा कंधा… बाकी सब मैं संभाल लूंगी। 
लेकिन बीतते वक्त के साथ मैंने ये जाना और समझा कि मेरे लिए तुम्हारा प्यार तो हर मायने में बढ़कर है…. परिस्थितियां चाहे जैसी भी रही हो तुमने हर कदम पर साथ दिया। फिर चाहे मुझे प्यार से समझाना हो या समझाने के लिए फटकार लगानी हो, तुमने हर स्थिति में मेरा मनोबल बढ़ाया मुझे प्रेरित किया मेरी ताकत बने। कभी बीमार भी रही तो भले तुम बाल सहलाने को पास नहीं थे लेकिन फोन पर अपनी नींदों की कुर्बानी देकर घंटों मेरे साथ रहे और सुलाया मुझे अपनी सांसों की लोरियां सुना कर… हां मेरी बहुत सी ख्वाहिशें थी अपने हमसफर को लेकर छोटी छोटी ही सही लेकिन थी….कि वो मेरे लिए ये करे वो करे….तुमने उनमें से भी बहुत कुछ किया और कुछ नहीं भी लेकिन कुछ चीजें जो तुमने की वो मेरी कल्पना के दायरे में भी नहीं थी….वो सबसे खास है।
वो सारी कहावतें जो मैंने सुनी थी जैसे जो होता है अच्छे के लिए होता है, सब्र का फल मीठा होता है या ईश्वर पर यकीन रखो उन्होंने कुछ इससे भी बेहतर सोच कर रखा है तुम्हारे लिए….तुमसे मिलने से पहले तक जिंदगी ने कभी अवसर ही नहीं दिया कि यकीन कर सकूं इन बातों पर लेकिन जब तुम आए तो अपने साथ मेरा यकीन भी लेकर आए।
शब्दों के सहारे की भी जरूरत नहीं होती मुझे तुम तो महज़ लिखने के लहजे से तो कभी आंखें पढ़ कर दिन भर का हाल जानें लेते हो…

Tum Alag Ho Mere Jajbaat Me
वैसे तो ये दूरी बहुत खलती है मुझे लेकिन कभी कभी ये दूरी भी खूबसूरत लगती है। तुम्हारा अपने बिस्तर पर होना और मेरा अपने बिस्तर पर फिर भी ऐसा लगता है मानो दोनों साथ ही हो…. मैंने अपना सिर तुम्हारे सीने पर रखा है और तुम मेरे बालों को सहलाते हुए मेरी सारी उलझनों का हल बता रहे हो मुझे और जब कभी चेहरे पर आती जुल्फों को हटाने को हाथ उठाती हूं तो बिस्तर के बाजू की खिड़की से आती बयारें ऐसा महसूस कराती है जैसे तुम हल्की फूंक से उन्हें हटा रहे हो।
तुम्हारी नामौजूदगी में भी तुम मुझमें कहीं मौजूद मालूम होते हो मुझे।
मुझसे जुड़ी हर छोटी से छोटी बात याद रहती है  तुम्हें….इतना तो मैं खुद को भी नहीं जानती जितना तुम मुझे जानने लगे हो… तुम्हें मालूम होता है कि मुझे तुम कब और किस रूप में चाहिए। तुम जानते हो कि कब मुझे तुम में एक दोस्त चाहिए और कब एक प्रेमी… तुमने कभी हमारे प्यार को वक्त का मोहताज नहीं होने दिया बस जब तुम्हें मुझ पर प्यार आया तुमने बिना कुछ सोचे लुटा दिया मुझ पर।
मैं बताना चाहती हूं उन सबको कि कुछ पुरूष अलग होते हैं…जो समझते हैं कि कब जरूरत है थोड़े अधिक प्रेम और हिम्मत की…जिनसे अपने हिस्से के वक्त के लिए लड़ना नहीं पड़ता।  वो भी स्त्रियों के ही भांति न्यौछावर कर देते हैं अपना सबकुछ अपनी प्रेयसी पर….वो करते हैं इश्क पूरी शिद्दत से खुशी खुशी लुटाते है उनपे इश्क अपना और तुम उन्हीं में से हो।
तुम कौन हो ये अभी नहीं बता सकती सबको इसीलिए खुद को बस तुम्हारी बता रही हूं।
मुझसे दूर होकर भी हर पल तुम्हारा मेरे साथ होने का एहसास मुझे तुम्हारे और करीब लाता है। यकीं मानो मैं यूंही तुम्हें ईश्वर तुल्य नहीं कहती…

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